क्या टीवी पर बच्चों को वल्गैरिटी देखने के लिए मजबूर किया जा रहा है?

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टीवी पर क्या दिखाया जाए या क्या नहीं, यह तय करने के लिए कोई फिल्टर अथॉरिटी होनी चाहिए?
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रीतू कलसी

टीवी पर क्या दिखाया जाना चाहिए और क्या नहीं, यह बहस का विषय है। हालांकि हर चीज को सेंसर से गुजारने से अभिवयक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होती है। टीवी घर में देखा जाता है। उसे सब देखते हैं। हमारे देश में बहुसंख्यक लोगों में अभी ये नहीं हुआ कि बच्चों को अलग से टीवी दिया जाए। लेकिन टीवी कार्यकमों को बनाने वालों और फिल्में बनाने वालों में अभी ये सोच विकसित नहीं हुई है कि अलग-अलग श्रेणियों के लोगों को ध्यान में रखकर कार्यक्रम बनाएं। इसलिए यह सवाल उठना लाजिमी है कि फिल्मों में दिखाए जाते द्विअर्थी संवादों और उनके विषयों का बच्चों के मनों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। यह एक ऐसा विषय है, जिस पर बात होनी चाहिए। हम बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहते हैं, दूसरी ओर उन्हें फूहड़ कार्यक्रम और फिल्में देखने को मजबूर करते हैं।

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ऐसा भी नहीं किया जाना चाहिए कि बच्चों को ध्यान में रखकर बड़ों के देखने वाले कार्यक्रम खराब कर दिए जाएं या फिर बड़ों के लिए बच्चों के कार्यक्रम खराब कर दिए जाएं। असल में दोनों ही का बराबर ध्यान रखा जाना चाहिए।

निर्देशकों को बच्चों से कोई सरोकार नहीं

कुछ दिन पहले मैं एक पंजाबी फिल्म देख रही थी। कामेडी फिल्म थी। सभ्य नही फूहड़। डायलाग तो एक हिसाब से एडल्ट की कैटागरी में ही रखे जा सकते हैं। मान लिया पर फिल्म बनाने वालों ने अपनी जिम्मेदारी नहीं समझी। जिस दिन फिल्म देख रही थी बायचांस उसी दिन एनडीटीवी पर हिंदी फिल्मों के डायरेक्टर रामगोपाल की इंटरव्यू सुनने को मिली। मेरी नजर में उनकी एक समझदार इंसान की छवि थी, है भी। खैर इस पर हमने बात नहीं करनी है। बात करनी है फिल्मों में एडल्ट सीन या डायलाग की। इनका सोचना है आजकल नैट पर सब उपलब्ध है तो फिर फिल्म में दिखाने से परहेज़ क्यों? अरे भाई पश्चिमी देशों में जहां खुला माहोल है, वहां पर भी बच्चों के लिए, टीनएजर के लिए, व्यस्कों के लिए अलहदा फिल्में बनती हैं और यहां आप लोग सब चलता है के नाम पर अपने बच्चो को क्यों समय से पहले बड़ा बना रहे हैं। छोटा पर्दा हो या बड़ा पर्दा, आज हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। इसलिए इन पर जो भी दिखाया जाए, उसे श्रेणीबद्ध किया जाना चाहिए और सख्ती से इन नियमों का पालन होना चाहिए।

फिल्मों में अक्सर एडल्ट कॉमेडी सुनने/देखने को मिल जाती है। इसका छोटे बच्चों और टीनेजर बच्चों के मनों पर क्या प्रभाव पड़ेगा- बिना यह ध्यान में रखे। निर्देशक को इससे कोई सरोकार नहीं है। यह सेंसर बोर्ड को देखना है। लेकिन टीवी के लिए अभी तक ऐसी कोई फिल्टर अथॉरिटी नहीं है, जो होनी चाहिए, जो यह तय करे कि टीवी पर किस तरह का कंटेंट दिखाया जाए और कौन-सा नहीं।

इस विषय पर पॉलीवुड के तीन निदेर्शकों ने भी अपनी बात रखी है।

 

टीवी के लिए भी सैंसर बोर्ड होना चाहिए : पाली भूपिंदर सिंह

प्रोड्यूसर का काम बस ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना होता है। यूथ को कैप्चर करना होता है। वह बाकी बातों के बारे में ज्यादा नहीं सोचते। लेकिन पंजाबी फिल्मों के बारे में एक बात कही जा सकती है कि जिस फिल्म में वल्गैरिटी हो, वो चलती ही नहीं। आप देख लें, पंजाबी में साफ-सुभरी फिल्में ही हैं। जितनी भी फिल्में चली हैं, फैमिली फिल्में ही हैं। दूसरी फिल्मों ने तो पानी भी नहीं मांगा है।

pali bhupinder

हां यह गंभीर समस्या है कि ऐसी फिल्में टीवी पर दिखा दी जाती हैं। पंजाब में टीवी पर फिल्में देखी जाती हैं। और घरों में सारे एक साथ बैठकर फिल्में देखते हैं। अगर कोई वल्गैरिटी वाली फिल्म चल रही हो, तो पूरे परिवार में न बैठा जाता है, न उठकर जाया जाता है।

मेरा मानना है जैसे धूम्रपान के लिए लिखा आता है, वैसे ही बड़ा-बड़ा सीन से पहले लिखा आना चाहिए 15 साल से कम के बच्चे उठकर चले जाएं। टीवी के लिए भी सैंसर बोर्ड होना चाहिए। सही बात है।

 

मैं एडल्ट कॉमेटी के खिलाफ हूं : दर्शन दरवेश

जो फिल्में यथार्थ के नजदीक होती हैं और उनका विषय किसी खास किस्म की सामाजिक नाबराबरी या फिर खुद पर हुए जुल्मों के दर्द आदि से संबंधित होता है। ऐसे माहैल के प्रति समाज या किसी व्यक्तिविशेष के प्रतिकरम के तौर पर हिंसा दिखाई जाती है तो वह शायद गलत नहीं। …अगर कहानी की मांग है और जायज किस्म के सीन दिखाने में कोई एतराज नहीं होना चाहिए। आज का बच्चा सारी बातों को समझता है। कई बार हमें ऐसे सवाल कर जाता है जिस बारे में हमारे पास भी जवाब नहीं होता। किसी भी किस्म का जुल्म सहन करना नजायज होता है और जब जुल्म हद से बढ़ जाए तो हथियार उठाना जायज होता है।

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ऐसी सीख तो हमें हमारे सिलेब्स में भी पढ़ाई जाती रही हैं। रही बात सैंसर बोर्ड की तो उसके बारे में तो आजकल हर फिल्मकार थू-थू कर रहा है। हर सरकार के अपने इशारे होते हैं। सैंसर अधिकारी की कलम उनके मुताबिक ही चलती है। यह सब सोची समझी साजिशों के तहत होता है, और करवाया जाता है। मुबंई हाईकोर्ट ने तो एक बार सपष्ट रूप से सैंसर बोर्ड को कह दिया था कि आपको यह भविष्यवाणी कहां से होती है कि फलां फिल्म को सैंसर सर्टिफकेट दे देता तो देश में हिंसा भड़क सकती थी। यह देखना मौके की सरकारों का काम होता है कि कैसे लॉ एंड ऑर्डर कायम रखा जाए।

हां यह बाम मैं सपष्ट तौर पर कहता हूं कि मैं एडल्ट कॉमेडी के खिलाफ हूं। ऐसी कॉमेडी बच्चों के लिए तो क्या बड़ों के लिए भी नहीं होनी चाहिए। क्या कोई बता सकता है कि ऐसी कॉमेडी किस किस्म का मनोरंजन करती है? ऐसी फिल्में बनाने वाले कभी भी ऐसी सार्थक बहस का स्वागत नही करते हैं। मैं पंजाबी के ऐसे उन लेखकों भी जानता हूं जिनकी साहित्य जगत में अच्छी जगह है। उन्होंने अच्छी किताबे भी लिखी हैं, पर फिल्में लिखते वक्त सारे मापदंड खूंटी पर टांग देते हैं। और निर्माताओं के इशारो पर उनकी मर्जी के मुताबिक लिखते भी हैं और एक्ट भी करते हैं। अब और क्या कहूं …?

 

ब्रॉडकास्टिंग के लिए नए नियम तय होने चाहिएं : राजदीप सिंह

 

मेरे ख्याल से टीनएजर को खुद ही वो फिल्म नहीं देखने जाना चाहिए, जिसे ए सर्टिफकेट मिला हो। वैसे आज के बच्चे जल्दी ग्रो हो रहे हैं।
rajdeep singh
पहले जो बात बारहवी में पढ़ने वाले बच्चे की समझ में नहीं आती थी, आज पांचवी में पढ़ते वाला बच्चा उसे समझ लेता है। जब बच्चा सब समझ ही रहा है तो… । सिनेमाघरों में 15 साल तक के बच्चों को भी टिकट बेच दी जाती है। यह गलत बात है। सरकार को इस बात की निगरानी करनी चाहिए। यदि फिल्में टीवी पर आती भी हैं, तो डायलाग पर ‘बीप’ की आवाज आती है। अब समय आ गया है कि ब्रॉडकॉस्टिंग के लिए भी नए सिरे से कुछ नियम तय हों।

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