तब पूरन पूरन हो गई…

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संगीत संसार को हंसराज हंस, जसबीर जस्सी और साबरकोटी जैसे कई अच्छे गायकों से नवाज़ चुके सूफी गायक उस्ताद पूरन शाहकोटी का पंजाबी संगीत क्षेत्र में खास मुकाम है। किसी समय अपनी गायकी के लिए चर्चा में रहे उस्ताद पूरन आज अपने शागिर्द गायकों की वजह से चर्चा में रहते हैं।

आप द्वारा सिखाए गए कलाकारों का नाम आज पूरे देश में है। आप कैसा महसूस करते हैं?
मैं कोई बहुत बड़ा कलाकार नहीं हूं। उस भगवान की मंज़ूरी के बिना कोई कुछ नहीं कर सकता। मुझे बस फकीर बनाम कलाकार कहा जा सकता है। माली पौधा लगाता है। जब उन पौधों पर फूल आते हैं तो माली को कितनी खुशी होती है, इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। इसी तरह अपने सिखाए शार्गिदों को जब बड़े मुकाम पर देखता हूं, तो बहुत खुशी होती है। यह भी कह सकते हैं कि जब किसी मां का बेटा जवान होकर कमाई करके लाता है, तो उसे जितनी खुशी होती है, उसी तरह का अहसास है। हंसराज हंस, साबरकोटी, जसबीर जस्सी और बेटे सलीम ने संगीत की दुनिया में मेरा नाम आगे बढ़ाया है। ठेठ भाषा में कहूं, तो इन्होंने मुझे घर बैठे थानेदारनी बना दिया है। मतलब, पहले जब किसी औरत का पति थानेदार बनता था, तो वह खुद-ब-खुद थानेदारनी बन जाती थी। बस ऐसा ही मेरे साथ भी है (हंसते हैं)।

गायकी की तरफ आपका रुझान कैसा हुआ?
हम भाई मरदाने के अंश हैं, जिनके डीएनए में ही गायकी होती है। हम लोगों में कुछ लोग कव्वालियां गाते हैं, कुछ लोग सूफी गायक हैं। मेरे पिता जी बापू निरंजन दास और दादा जी भी बहुत अच्छे गायक थे। आप कह सकते हैं कि हमारे खून में ही गाना है। जब मैं पैदा हुआ तो मेरी मां ने सुर में ही मुझे लोरी दी। स्कूल के दिनों से ही मैं गा रहा हूं।
आपने सूफी गायन को ही क्यों चुना?
असल में हमारी जो फैमिली थी, वो सूफी ही थी। मेरे पिता जी बापू निरंजन जी सूफी गायन करते थे। यह देश के बंटवारे से पहले की बाते हैं। सूफी गायकी सच्ची गायकी होती है। दुनियावी प्यार से ऊपर उठकर जब ईश्वर के प्यार की पोइट्री गाई जाती है, तो वह सूफी गायकी कहलाती है। मुझे यह अच्छी लगती थी। इसलिए मैंने यह रास्ता अख्तियार किया।
आपका बचपन कहां और कैसे बीता?
मेरा बचपन जालंधर के एक गांव शाहकोट में बीता। इसी से मेरे नाम के पीछे शाहकोटी लगा हुआ है। वहीं मेरी शिक्षा-दीक्षा हुई। स्कूल में भी मैं गाने में पहले नंबर पर आता। शाहकोट में रहते हुए ही मैंने मैट्रिक की और इसी दौरान शादी-ब्याहों और जगरातों में गाना शुरू कर दिया। कहीं जागरण होता या मेला लगता तो गाने के लिए मुझे बुलाया जाने लगा। बस तभी मैंने यह सोच लिया था कि यही मेरा रास्ता है। इसी पर आगे बढऩे के लिए मैं जालंधर शहर आया। इसके बाद का समय बहुत संघर्ष का है, जो फिर कभी बताऊंगा।
कैसा संघर्ष था वो?
दुनिया में जहां कहीं भी गायक कलाकार है, उसे गाने का मौका चाहिए। जब मैं यहां आया तो कार्यक्रमों में जाकर गाने का मौका मांगता। एक रोचक बात बताता हूं। मैं कई बार रेडियो स्टेशन भी गया। लेकिन वहां बाहर से ही मुझे गार्ड एंटर नहीं होने देता था। शायद 1972-73 की बाते हैं। उन दिनों मैंने जालंधर में रामलीलाओं में भी गाया। तभी एक बार जब मैं गा रहा था, तो एक आदमी गाड़ी से आया और रामलीला के प्रबंधकों से पूछने लगा कि जो लड़का पहले गा रहा था, मैं उसे सुनना चाहता हूं। लेकिन कोई नहीं चाहता था कि मुझे मौका दिया जाए। उनका सीन लेट हो रहा था। मुझे लगा वह मेरे बारे में पूछ रहा है। मैं भागकर उनके पास जा पहुंचा। उन्होंने पूछा कि आप गा रहे थे? मैंने हां कहा तो उन्होंने बताया कि वह जालंधर रेडियो स्टेशन के डायरेक्टर एनएम भाटिया हैं। उन्होंने मुझे अगले दिन स्टेशन बुलाया। मैं तैयार होकर समय से पहले ही वहां पहुंच गया। तब जो गार्ड मुझे स्टेशन के अंदर नहीं घुसने देता था, उसी ने मुझे सैल्यूट करके अंदर भेजा। उसके बाद मैंने बहुत गाया। इतना गाया कि बस पूरन, पूरन हो गई। फिर मैं दुनिया के बहुत सारे देशों में गया और अपने फन का मुज़ाहरा किया।
आपने आज के कई नामी गायकों की अगुवाई की है, यह सिलसिला कैसे शुरू हुआ?
…असल में जब टीवी शुरू हुआ, तो भाटिया साहिब की बदौलत दिल्ली दूरदर्शन ने रीजनल सेंटर के लिए मेरी रिकॉर्डिंग की। जब वो चली तो पूरा पंजब मुझे जानने लगा। उन्हीं दिनों शागिर्द के रूप में हंसराज हंस मुझे मिला। फिर साबरकोटी और फिर जसबीर जस्सी। इस तरह और भी कई शार्गिद हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा के दम पर अपना नाम तो रोशन किया ही, मैं कहूंगा कि उनकी बदौलत मेरा नाम ऊंचा हुआ।
आज के दौर की गायकी के बारे में क्या सोचते हैं?
आज मैं सोचता हूं, इस क्षेत्र में नौसिखिए ज्यादा आ रहे हैं। जिसके पास पैसा है, वो गायक भी बन जाता है, म्यूजीशियन भी बन जाता है। मैं कहना चाहता हूं कि अगर किसी ने इस क्षेत्र में आना है तो वह सीखकर आए, मेहनत करे। बस यूं ही आकर कला का नुकसान ना करे। सिर्फ पैसे के दम पर कलाकार नहीं हुआ जा सकता। कलाकार बनने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। बहुत कुछ सीखना पड़ता है।
आपकी नज़र में अच्छी गायकी क्या है?
जो गाना हम अपनी फैमिली में बैठकर सुन सकें, वही अच्छी गायकी है। जान-बूझकर अश्लीलता का सहारा लिया जाए या ऐसे कहें कि गीत सुनाने के लिए भद्दे सहारे लिए जाएं, तो उस गायन का क्या फायदा? क्या संगीत इतना कमज़ोर हो गया कि उसे इस तरह के सहारों की ज़रूरत है! संगीत तो रूह को शांति देने वाली चीज़ है। आजकल जिस तरह की वीडियो गीतों के साथ दिखाई जाती हैं, उनका संगीत से क्या लेना-देना है। हमारी तो गुरबाणी भी संगीतमय है। …यह तो आराधना है। गीत में कशिश होनी चाहिए। एक उस्ताद होने के नाते मैं चाहता हूं कि गायकी के स्वरूप को अगर अच्छा नहीं बना सकते, तो कम से कम उसे बिगाडऩा तो नहीं चाहिए।
आजकल कहा यह जा रहा है कि लोग जो पसंद करते हैं, वहीं गाया जाता है?
मैं इस बात को नहीं मानता। हर श्रोता अच्छा सुनना चाहता है। अगर उसे अच्छा नहीं मिलेगा, तो वो वही सुनेगा जो उपलब्ध है। उसे अच्छा उपलब्ध करवाएंगे, तो वह उसे सुनने से इंकार थोड़े करेगा, बल्कि उसे अच्छा सुनने की आदत पड़ेगी। असल में जब आप बुरा संगीत पैदा करेंगे, तो आने वाली जेनरेशन उसी को संगीत समझेगी। यानी हम उस जेनरेशन का नुकसान कर रहे हैं।
प्लेबैक सिंगिंग के बारे में क्या सोचते हैं?
यह बहुत अच्छी है। मुझे तो इस बात की खुशी है कि हमारी फिल्मी गायकी पर पंजाबी गायकी का बहुत प्रभाव है। पंजाबी सिनेमा पर तो है ही, बॉलीवुड पर भी यह असर साफ दिखाई देता है। ज्यादातर बॉलीवुड फिल्मों में पजाबी गायकी का तड़का जरूर लगाया जाता है।
लोग आपको भी सुनना चाहते हैं। यह इच्छा कब पूरी होगी?
असल में मेरी बायपास सर्जरी हुई है और डॉक्टरों ने गाने से मना किया हुआ है। गाने के लिए दम की जरूरत होती है, जो अब मुझमें शायद ना हो। (हंसकर)… मैं बहुत अच्छा गाने के बाद बहुत बुरा नहीं गाना चाहता?

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