Published On: Sat, Nov 24th, 2018

पहली बार कैमरे के सामने दिया किस

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पुरानी हिंदी फिल्मो में सेक्स और अंगप्रदर्शन काफी रहता था तब भारत में अंग्रेजों का राज था जिस कारण इसे बुरा नहीं माना जाता था, आज कल की फिल्मों में किस सीन्स पर काफी हंगामा रहता है पर तब की फिल्मो में भी किस सीन्स रहते थे हमारा हिन्दुस्तान में अभिनेत्री सुलोचना का फिल्म के हीरो जार्ज के साथ दिया किस सीन आज की फिल्मो के किस सीन को भी पछाड़ता है

शुरू-शुरू में तस्वीरों को चलते-फिरते और बोलते देख कर अनपढ़ और बोलते देक कर अनपढ़ भोले-भाले देहाती मुंह फाड़ कर रह जाते। परदे पर रेलगाड़ी, सांप या शेर को देख उसको वास्तविक मान बैठते। इस संदर्भ में एक दिलचस्प घटना का जिक्र अप्रासंगिक नहीं होगा। एक फिल्म बनी थीं ‘पंजाब मेल’। इसमें नायिका सुलोचना (रूबी मेयर्स) एक तालाब में नहाने जाती है और एक-एक कर कपड़े खोलने लगती है। तभी पंजाब मेल धड़धड़ाती हुई आ जाती है, जिससे वह दिखाई नहीं देती। इस दृश्य को देखने के लिए कुछ दर्शक बार-बार सिनेमाहाल में यह सोच कर जाते थे कि किसी न किसी दिन तो गाड़ी अवश्य लेट होगी। किंतु सैकड़ों ‘शो’ देखने के बाद भी गाड़ी लेट नहीं हुई और न ही सुलोचना को नग्न देखने की दर्शकों की लालसा ही पूरी हुई।

सुलोचना (रूबी मेयर्स)1930 के दशक में सबसे लोकप्रिय अभिनेत्री थी। 1930 के दौर में सुलोचना इंडियन फिल्म इंडस्ट्री की शीर्ष अभिनेत्री थीं। उन्होंने शुरुआत तो अवाक फिल्मों के समय से की लेकिन बोलती फिल्मों के दौर की शुरुआत में भी उनका सिक्का फिल्म इंडस्ट्री पर खूब चला। हिन्दी सिनेमा में विशेष योगदान के लिए 1973 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
अवाक फिल्मों के दौर में ही सुलोचना के खाते में कई हिट फिल्में थीं। बोलती फिल्मों के आने के बाद सुलोचना का करियर थोड़ा ठहर गया। सुलोचना असल में क्रिश्चियन थीं और उन्हें ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा बहुत अच्छे से नहीं आती थी। बोलती फिल्मों के आने के साथ ही डायलॉग बोलने की दक्षता जरूरी हो गई। ये सुलोचना के करियर के लिए एक धक्का था। कुछ वक्त ऐसे ही चला, मगर फिर सुलोचना ने हार ना मानने का फैसला लिया। उन्होंने एक साल का ब्रेक लेकर हिन्दुस्तानी धड़ल्ले से बोलने की तालीम ली और फिर वापसी की। सबसे पहले उन्होंने 1920 के दौरान बनी अपनी फिल्मों का रीमेक 1930 के दौरान रिलीज किए। सभी फिल्में बहुत सफल हुईं और सुलोचना फिर टॉप तक पहुंच गईं। मगर 1940 से सुलोचना के करियर में ढलान जो शुरू हुआ तो फिर वह संभल नहीं सकीं। नई अभिनेत्रियों के सामने सुलोचना मुकाबला नहीं कर सकीं। चरित्र भूमिकाओं के सहारे उन्होंने वापसी की कोशिश की लेकिन फिर कभी हालात पहले जैसे ना हो सके।सुलोचना ने अनारकली नाम की तीन फिल्में कीं। तीनों एक ही कहानी का रीमेक थीं। पहली अनारकली, जिसमें सुलोचना मुख्य अभिनेत्री थीं, अवाक फिल्मों के दौर में बनी, जब सुलोचना ने बोलती

फिल्मों में वापसी की तो उन्होंने अपनी फिल्म अनारकली को फिर से बना कर फिर उसमें लीड रोल किया और फिल्म जबरदस्त चली। तीसरी अनारकली उनके हिस्से आई तब, जब वह अपने खत्म होते करियर को संभालने की कोशिश कर रही थीं, इस अनारकली से उन्होंने वापसी की, लेकिन अनारकली नहीं, सलीम की मां के रोल में।
कहा जाता है कि सुलोचना को उन दिनों बॉम्बे के गवर्नर से भी ज्यादा पैसे मिला करते थे, ये रकम थी 5000 रुपए। वह इतना कमाने वाली इकलौती अभिनेत्री थीं। सुलोचना के पास एक शेवरोले 1935 थी, जिसे वह खुद चलाती थीं। रूबी मेयर्स की लोकप्रियता का हाल ये था कि एक आयोजन के मौके पर खादी एग्जिबिशन इनॉगरेट करते हुए महात्मा गांधी पर बनी एक शॉर्ट फिल्म दिखाए जाते वक्त, आयोजकों ने उसके साथ ही फिल्म माधुरी (अवाक दौर की फिल्म) से सुलोचना का एक प्रसिद्ध नृत्य दृश्य के कुछ साउंड इफेक्ट ऐड करके चला दिया। सुलोचना और डी बिलीमोरिया (अवाक फिल्मों के सुपरस्टार) का अफेयर बहुत प्रसिद्ध हुआ। 1933 से 1939 के बीच सुलोचना ने सिर्फ बिलीमोरिया के साथ फिल्में कीं। इसके बाद दोनों में दूरियां आ गईं।

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CineDunya Desk

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