प्रोड्यूसर, डायरेक्टर बनने का शौक पूरा कर रहे हैं

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आज ऐसा लगता है, हर दूसरे गायक के अंदर हीरो बनने की लालसा है। मैं गायक के हीरो बनने के खिलाफ नहीं।

-इकवाल सिंह चाना

शादी विषय पर बनी कुछ फिल्में क्या चलीं, फिल्मकारों ने भ्रम पाल लिया कि शादी पर बनी फिल्में सफल होती हैं। अब हर कोई शादी पर उल्टे-सीधे टोटके दिखाकर अपनी जेबे भरना चाहता है। लगता है ये फिल्मकार तब तक नहीं हटेंगे, जब तक शादी विषय की अच्छी गत नही हो जाएगी। इस विषय पर आई दो नई फिल्में ‘परोहणा’ और ‘कुड़माइया’ आई हैं, जो नई कम और पुरानी घिसी हुई ज्यादा लग रही हैं।
मुंबई में अपने एक दोस्त के साथ ‘कुड़माइया’ फिल्म देखने गया तो सिनेमा वालो ने शो कैंसिल कर दिया क्योंकि हम दो ही दर्शक थे। दो दिन के बाद अमृतसर में फिल्म देखी। बड़ी निराशा हुई। फिर ‘परोहणा’ देखने गया। शुक्र है शो कैंसिल नहीं हुआ, 20 के करीब दर्शक थे। मैंने सोचा दोनों फिल्मों का रिव्यू एक साथ ही कर देता हूं क्योंकि दोनों फिल्मों में बहुत-सी चीजें जैसी हैं।


पहली बात दोनों फिल्मों में दो गायकों ने अपने हीरो बनने का शौक पूरा कर लिया है। ‘कुड़माइया’ मे हरजीत हरमन ने और ‘परोहणा’ में गायक कुलविंद्र बिल्ला ने। असल में दोनों की एक्टिंग जीरो हैं। पंजाब में हर गायक हीरो बनने चल पड़ा है। वे यह भूल गए हैं हीरो मैटीरियल भी कोई चीज होती है। पहले समय में गायको की प्रसिद्धि को कैश करने के लिए उनका अखाड़ा फिल्म में डाल दिया जाता था।

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पंजाबी फिल्मों में कुलदीप माणक, मुहम्मद सद्दीक, गुरचरण पोहली, सुरजीत बिंदरखीया, चमकीला और सुरिंद्र छिंदा जैसे दिग्गज गायको के अखाड़े या फिर गेस्ट रोल पुरानी फिल्मों में देखे जा सकते हैं। हीरो बनने का कीड़ा इनके अंदर नहीं था। पर आज ऐसा लगता है, हर दूसरे गायक के अंदर हीरो बनने की लालसा है। मैं गायक के हीरो बनने के खिलाफ नहीं। कई साल पहले गुरदास मान पंजाबी हीरो बनकर आए थे, तो दर्शको ने खुशी-खुशी स्वीकार किया। क्योंकि उसमें स्टार मैटीरियल भी था। इसी तरह गिप्पी, दिलजीत इसी गायकी के फील्ड से आए। यह हीरो मैटीरियल थे और अभिनय को निखारने के लिए भी खूब मेहनत की।
‘परोहणा’ में कुलविंद्र बिल्ला की बात करें तो मुझे कहने में कोई झिझक नहीं कि उसे अभिनय बिलकुल नहीं आता। फिल्म के पहले सीन में दिखाया गया है कि वह प्रीति सपरू पर मरता है। उस जैसी लड़की से शादी करना चाहता है। वामिका गब्बी में उसे प्रीति सपरू नज़र आती है। यह देखकर मेरी हंसी निकल गई। प्रीति बहुत सुंदर हीरोइन थी पर अभिनय बिलकुल भी बढ़िया नहीं। वामिका कमाल की अभिनेत्री हैं। मैं दो पंजाबी अभिनेत्रियों का फैन हूं। वामिका में से जया भादुड़ी और सिम्मी चाहल में समिता पाटिल की झलक कहीं ना कहीं मिलती है। ‘परोहणा’ में वामिका के करने के लिए कुछ खास नहीं था पर वह जिस भी सीन में आई है या गाने में- वह सब खुद चुरा लेती है।

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‘परोहणा’ के प्रोमो देखकर लगा था कुछ देर पहले आई फिल्म ‘लावां फेरे’ जैसी होगी पर कॉर्बन कॉपी ही होगी, यह नहीं सोचा था। उस फिल्म में पॉली भुपिंदर की ओर से लिखे गए जीजों के पंचों में जान थी। पर यहां सब लाउड है। पागलखाने जैसा महौल पैदा करने वाली कॉमेडी है।
‘कुड़माइया’ भी शादी की भूल-भूलैया वाली कहानी है। यहां हरजीत हरमन दूल्हा है, जपजी खैरा उसकी दुल्हन है, जिसकी फोटो ना देख सकने के कारण हरजीत का रिश्ता होते-होते रह जाता है। यह ही इस फिल्म की कहानी है। हरमन और हरजीत दोनों अपने किरदारों से बड़ी उम्र के लगते हैं। फिल्म के पहले सीन में बताया जाता है जपुजी 12वीं क्लास की छात्रा है। हाल में मेरे पीछे बैठी एक मैडम ने कमैंट किया 12वीं की स्टूडैंट तो नहीं टीचर लगती है।


यहां भी शादी के झमेले में फंसे हुए किरदार जबरदस्ती कॉमेडी कर रहे लग रहे हैं। हरमन रटे हुए डॉयलाग डिलिवर कर रहा लगता है। जपुजी खैरा अभी भी पहले जैसी खूबसूरत हैं। अनीता देवगन फिलर टाइप रोल के लिए रह गई लगती हैं। ‘नाबर’ में जबरदस्त किरदार निभाने वाले हरदीप गिल्ल को देखकर लगता है, जैसे उससे जबरदस्ती कॉमेडी करवाई गई है। गुरमीत साजन, जो फिल्म के निर्देशक भी हैं, अपने किरदार में ओवर ज्यादा लगते हैं।
अंत में दोनों फिल्मों की एक ओर एक-सी बात का जिक्र कर लें। दोनों के डायरेक्टर भी दो-दो हैं। ‘कुड़माइयां’ के गुरमीत साजन, मनजीत सिंह टोनी। गुरमीत साजन प्रोड्यूसर भी हैं। ‘परोहणा’ को अमृत राज चड्ढा और मोहित बनवैत ने डायरैक्ट किया है। यहां भी मोहित प्रोड्यूसर हैं। दरअसल पंजाबी फिल्म वालों ने डायरेक्शन को असान काम समझ लिया है। प्रोड्यूसर, डायरेक्टर बनने का शौक पूरा कर रहै हैं। यही रुझान रहा तो जल्द ही पंजाबी फिल्मों के छह-छह डायरेक्टर भी देखने को मिल सकते हैं। और फिल्में कैसी बनेंगी आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं। रब खैर करे।

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