बढ़िया हिंदी फिल्म की घटिया कॉपी है ‘हार्ड कौर’

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hard kaur

फिल्म में हीरोइन दीना उप्पल समेत बाकी सारी महिला कलाकार दुखी आत्माएं ज्यादा नजर आती हैं।

हार्ड कौर दर्शाकों के सामने आई और चली भी गई। पहली बात यह समझ में नहीं आई कि फिल्म का टाइटल “हार्ड कौर’ क्यों रखा गया। टाइटल देखकर लगता था कि फिल्म आज के पंजाब की किसी बहादुर औरत, सिंहनी या खतरों से खेलने वाली मुटियार की कहानी होगी, पर निकला सबकुछ इसके उलट। फिल्म में मुख्य किरदार निभा रही सब लड़कियां बेबस, मजबूर और कमजोर। हाल ही में आई “पिंक’ की कॉपी करके “हार्ड कौर’ बना ली गई। काश कॉपी भी ढंग से करते। फिल्म की कहानी में चार युवतियां हैं, एक वृद्ध सिंहनी है, एक कैनेडा से आया हीरो है। सारे के सारे नरम हैं, अगर कोई हार्ड है तो वाे है फिल्म का खलनायक।
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फिल्म की कहानी का मुख्य पात्र स्कूल में पढ़ाने वाली टीचर सीरत कौर है। स्कूल में उसे कम दिखाया गया है और बस में ज्यादा। मैरिज ब्यूरो के माध्यम से कैनेडा से आए डॉक्टर लड़के से रिश्ता होता है, दो तीन डेडिंग के सीन हैं और आधा गाना (सीरत के मुसीबत में फंस जाने के बाद हीरो सारी फिल्म से बाहर कर दिया जाता है)। खलनायक जो सीरत के पीछे हाथ धोकर पड़ जाता है, फिल्म का एकलौता हार्ड किरदार है। पहले भी वो सीरत की सहेली समेत दो तीन लड़कियों का भविष्य खराब कर चुका है। बस में सीरत को किडनैप करते समय सिख बीबी विरोध करती है तो खलनाायक उसे गोली मारकर ढेर कर देता है और आरोप सीरत पर लगा देता है।
इंटरवल पर सीरत सलाखों के पीछे चली जाती है और बाद में सारी फिल्म में कोर्ट का डरामा। फिल्म का अंत दर्शकों को आधी फिल्म तक ही पता चल जाता है। कोर्ट का ड्रामा भी ऐसा कि कोर्ट-कचहरी के विषयों पर फिल्में बनाने वाले बीआर चोपड़ा भी ऊपर कहीं सिर पीट रहे होंगे। खलनायकों का वकील मदन सूरी वकील कम और जोकर ज्यादा लगता है। इसी तरह सीरत की वकील अमरजीत कौर (दृष्टि गरेवाल) वकालत से ज्यादा रोने-धोने का ड्रामा करती रहती है।
कलाकारों का जिक्र भी क्या करें। निर्देशक और लेखक अजीत राजपाल का स्क्रीनप्ले तो ढीला है ही, अदाकारों को किरदारों के हावभाव में ढालने में भी वह विफल रहा है। हीरोइन दीना उप्पल समेत बाकी सारी महिला कलाकार दुखी आत्माएं ज्यादा नजर आती हैं। हीरो के छोटे से रोल में राज सिंह झिंजर कैनेडा से आया डॉक्टर है, पर डायरेक्टर उससे कैनेडा में रहने वाले डॉक्टर लड़कों वाले हावभाव जरा भी पेश नहीं करवाय पाया और ना ही सिंहनी के रूप में निर्मल ऋषि को सही तरीके से उभार पाया है। वो भी दर्शनीय दिलेर सिंहनी बनकर रह गई है। फिल्म में अगर किसी ने प्रभावित किया है तो वो केवल खलनायक के रोल में चैतन्य कन्हाई ने। एक बिगड़े हुए सिरफिरे पंजाबी मुंडे के किरदार को चैतन्या बहुत सफलता से निभा गया। लगता ही नहीं था कि वो एक्टिंग कर रहा हो। फिल्म का गीत-संगीत भी फिल्म की तरह ढीला है। कुल मिलाकर बिना अच्छी कहानी से बनी इस फिल्म ने निराश ही किया है।
– मनन चौहान

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