‘मसान’ – ध्वस्त होती अपेक्षाएं

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रमेाश उपाध्याय
‘मसान’ आज हमने भी देख ली, लेकिन लगा कि इसके बारे में जो पढ़ा और सुना था, उसने हमारी अपेक्षाएँ कुछ ज्यादा ही जगा दी थीं. सबसे पहले तो ‘हिंदू’ में इसके लेखक वरुण ग्रोवर का साक्षात्कार पढ़कर जो अपेक्षाएँ जगी थीं, बुरी तरह ध्वस्त हुईं. दुष्यंत कुमार और चकबस्त के नाम से जो तूमार बाँधा गया था, और फिल्म में श्वेता को जिस तरह शायरी और संगीत की समझ रखने वाली दिखाया गया, उसको देखते हुए फिल्म में गीत-संगीत क्या है? दूसरे, फिल्म की समीक्षाओं में सेक्स और जाति से संबंधित सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने के जो दावे किये गये थे, उनमें क्या सचाई थी? आखिर क्या टूटा और क्या बदला?massan
डोम लड़के और गुप्ता लड़की की प्रेम कहानी को उसकी परिणति तक पहुँचाने का साहस नहीं हुआ तो प्रेम को विवाह में बदलने को तैयार लड़की को दुर्घटना में मार दिया. फिर इसका औचित्य साबित करने के लिए मृत्यु का दर्शन बघारने की फालतू कोशिश के साथ जलती चिताओं के दृश्य देर-देर तक बेवजह खींचकर फिल्म को उबाऊ बनाना! इससे न कोई गंभीर विचार सामने आता है न अच्छा सिनेमाई कला-कौशल. यदि डोम लड़के और गुप्ता लड़की की प्रेम कहानी को साहसपूर्वक कहा जाता तो ये दोनों चीजें फिल्म में अपने-आप आ जातीं. और फिल्म का अंत तो दकियानूसी की हद है. जैसे कहा जा रहा हो कि ‘ऐसी’ लड़की को ‘ऐसा’ ही लड़का मिलेगा और ‘ऐसे’ लड़के को ऊँची जाति की ‘ऐसी’ ही लड़की मिल सकती है!
हाँ, अभिनय की दृष्टि से सभी कलाकारों का काम प्रशंसनीय है.ऋचा चड्ढा, श्वेता त्रिपाठी, संजय मिश्रा और बाल कलाकार निखिल ने बढ़िया काम किया है और विकी कौशल का तो कहना ही क्या! उसने सबसे अधिक प्रभावित किया. एक बार तो रुला भी दिया.
(लेखक हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं। उनके फेसबुक वॉल से साभार)

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