रौशन प्रिंस – मैं तो स्पष्ट कहता हूँ कि दर्शकों को, लोगों को अच्छी फिल्म हज़्म नहीं होती

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मुझे यही शिक्षा मिली है अब। अगर कोई अच्छी चीज़ देखना ही नहीं चाहता, तो मैं क्यों अपना करिअॅर बर्बाद करूं।

आप एक्टर होने से पहले गायक हैं। सबसे पहले यह बताइए, गायकी की तरफ रुझान कैसे हुआ?
मैंने म्यूजि़क में ही अपना करिअॅर बनाने का सोचा हुआ था। इसीलिए मैंने म्यूजि़क में ही पोस्ट ग्रैजुएशन की। अगर मैं प्रोफैशनल आर्टिस्ट ना होता, तो किसी ना किसी कॉलेज में संगीत पढ़ा रहा होता। एक शो हुआ था ‘आवाज़ पंजाब दी’ जो मेरी जि़ंदगी के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। मैं उसका विनर रहा। उसमें मैंने कई नाम दिए थे ताकि किसी ना किसी तरह सिलेक्ट हो जाऊं। मेरा असली नाम राजीव शर्मा है। मैंने एक एंट्री फॉर्म अपने दादा जी का नाम ‘रौशन’ और अपना घर का नाम ‘प्रिंस’ मिलाकर ‘रौशन प्रिंस’ के नाम से भरा था। वही सिलेक्ट हुआ और मैं जीतने के बाद इसी नाम से जाना जाने लगा।


गायकी की तरफ आने के फैसले पर घरवालों का कोई एतराज़…
बिल्कुल नहीं। मेरे बाबा जी पं. रौशन लाल खुद संगीत से जुड़े हैं। उन्हीं से संगीत की शुरुआती शिक्षा लेने के बाद मैंने प्रो. शमशाद अली जी से संगीत सीखा। हमारा पूरा परिवार संगीत से जुड़ा हुआ है।
जब आप ‘आवाज़ पंजाब दी’ के लिए सिलेक्ट हुए तो कैसा महसूस हुआ?
बहुत अच्छा लगा। जब मेहनत को सफलता मिलती है, तो एक रास्ता भी मिल जाता है कि मुझे किधर जाना है। बस इससे मुझे भी रास्ता मिल गया था। इससे पहले नहीं सोचा था कि संगीत को प्रोफैशन बनाऊंगा। अब यह मेरी रोज़ी-रोटी का ज़रिया भी बन गया। मुझे मंजि़ल की ओर जाने का रास्ता मिल गया था।
फिल्मों की ओर कैसे आए?
फिल्मों में आने का माध्यम भी मेरी गायकी ही बनी। मेरा एक गीत ‘… तां हो सकदै तैनूं भुल्ल जावां’ आया था। उसका वीडियो बहुत अच्छा शूट हुआ था। डायरेक्टर ने देखा, तो मुझे एप्रोच किया। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म ‘लगदा इश्क हो गया’ का सेंट्रल कैरेक्टर आपसे बिल्कुल मिलता है और मैंने यह फिल्म करनी स्वीकार कर ली।
संगीत बहुत मेहनत और रियाज़ मांगता है। फिल्मों से जुड़कर यह प्रभावित नहीं हुआ?
नहीं ऐसी कोई बात नहीं। मैं बचपन से संगीत से हुड़ा हुआ हूं। यह मेरा पहला पैशन है। मैं सातवीं क्लास में था, जब से स्टेज पर गा रहा हूं। कुछ भी कर लूं, यह साथ-साथ चलता रहता है। नौ साल मैं अपने उस्ताद जी के साथ रहा हूं। प्रॉपर शागिर्दी करके मैंने संगीत की तालीम हासिल की है। वह यह मानते थे कि जो भी काम करो, सही तरीके से सीखकर करो। मैं फिल्मों में भी पूरी तैयारी के साथ ही आा आया हूँ ।


अब आगे एक्टिंग को ज्यादा समय देंगे या संगीत को?
देखिए, भले ही मैं फिल्मों से जुड़ गया हूं लेकिन संगीत मेरी प्राथमिकता रहेगा। शूटिंग के दौरान भी जब कोई शो आए, तो मैं उसे नहीं छोड़ता। ऑडियंस के साथ राब्ता बना रहना गायक के लिए बड़ा ज़रूरी है। अब फिल्मों का दौर अच्छा चल रहा है, तो फिल्में भी सा-साथ चलती रहेंगी।
ज्यादातर कॉमेडी फिल्में ही क्यों? आपको कोई अच्छे सब्जेक्ट की फिल्म में काम का ऑफर दे तो…
जब मैंने अच्छे सब्जेक्ट पर फिल्म की तो उसे लोग देखने नहीं गए। अब कसूर कलाकारों का नहीं दर्शकों का है। अब हम सवाल पूछते हैं। अब क्वेशचन मार्क दर्शकों पर है। मैं तो स्पष्ट कहता हूँ कि दर्शकों को, लोगों को अच्छी फिल्म हज़्म नहीं होती। अगर लोग अच्छी फिल्म देखना ही नहीं चाहते, तो कोई क्यों बनाकर अपना नुकसान करेगा।मैं पचास बार सोचूंगा जी… मैं शिक्षा देने के लिए नहीं बैठा हूं। मुझे यही शिक्षा मिली है अब। अगर कोई अच्छी चीज़ देखना ही नहीं चाहता, तो मैं क्यों अपना करिअॅर बर्बाद करूं। सि$र्फ कलाकार कुछ नहीं कर सकता, उसके साथ ऑडियंस का होना ज़रूरी है। लेकिन मैंने देखा है, लोग बात तो करते हैं कि कलाकार अच्छा काम करे, अच्छे सब्जेक्टों पर फिल्में बनाए। जब बनाई जाती है, तो उसे देखने नहीं जाते। अब बताइए कलाकार क्या करे? उदाहरणें आपके सामने हैं।

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CineDunya Desk

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