मैं चाहता था कि मेरे कुत्ते फिल्म में दिखाए जाएं …

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डायलॉग बोलने के खास अंदाज़ से जाने जाते गुग्गू गिल ने पॉलीवुड को विशेष पहचान दी है। एक फिल्म में कुत्तों की लड़ाई के साथ स्क्रीन पर अपने करिअॅर की शुरुआत करने वाले गुग्गू गिल द्वारा बोले गए डायलॉग इतने चर्चित हैं कि नई पंजाबी फिल्मों में भी इस्तेमाल किए जाते हैं

आज के दौर में बन रही पंजाबी फिल्मों और जब आपने काम शुरू किया था, उस दौर की फिल्मों में क्या अंतर देखते हैं?
कोई ज्यादा फर्क तो नहीं है। इतना ज़रूर है कि अब पंजाबी फिल्मों के बजट पहले से बहुत अच्छे हो गए हैं। जब हमने शुरुआत की थी, लाखों की बात होती थी। अब कारोबार में करोड़ों की बात की जाती है। रिटर्न अच्छी हो गई है। तकनीक ने बहुत विकास कर लिया है। एक और बात बदली है। उस दौर में बड़े अंजान से लोग इस फील्ड में थे। हांलांकि हमारी उस दौर की फिल्में चलीं खूब। लेकिन अब तकनीक से लेकर एक्टिंग तक सब लोग बड़े मंजे हुए हैं। ट्रेंड हैं। तब मीडिया का भी इस तरह का साथ नहीं था, जैसा आज मिल जाता है।
एक समय में पंजाबी सिनेमा ने बहुत मुश्किल दौर देखा। कैसी मुश्किलें थी तब सिनेमा और इसके लिए काम करने वालों के सामने?
उस समय कोई भी बाहर से यहां आकर काम करने को तैयार नहीं था। सबको डर था। मैं क्योंकि यहां का था। मेरा गांव राजस्थान के बॉर्डर के बिल्कुल साथ लगता है। उस ऐरिया में हमने कई फिल्में उस दौर में कीं, जो हिट भी हुईं। असल में वहां काम करते हुए युनिट डरती नहीं थी, क्योंकि वह पंजाब का एरिया नहीं था। अपने समय की हिट ‘जट्ट ते ज़मीन’ उन्हीं दिनों की थी।
आपने उस दौर में भी काम जारी रखा। क्या आपको किसी तरह की मुश्किल का सामना करना पड़ा?
जी हां बिल्कुल। एक-दो बार हमें फिल्में ना करने की धमकियां दी गईं, लेकिन वाहेगुरु की मेहर और हिम्मत-हौसले से हम काम करते रहे। अगर ऐसा ना करते, तो शायद इतना काम भी ना कर पाते।
एक्टिंग की तरफ कैसे आए?


यह तो एक इत्तेफाक ही है। मैं इस फील्ड से संबंधित नहीं था और ना ही इधर आने का पहले कभी सोचा ही था। असल में मेरे बड़े भाई साहब के दोस्त फिल्मों से संबंधित थे। उनकी प्रेरणा से मेरे बड़े भाई साहब ने गिल आट्र्स के बैनर तले पहली फिल्म ‘पुत्त जट्टां दे’ बनाई। हुआ यह कि उसमें मुझे एक छोटा-सा रोल दे दिया गया, जो कुत्तों के साथ था। कुत्ते मेरे थे। मज़े की बात यह है कि मैं चाहता था कि मेरे कुत्ते फिल्म में दिखाए जाएं। बस उनके साथ मैं भी फिल्मों में आ गया। वह सीन मेरे लिए एक तरह से स्क्रीन टैस्ट साबित हुआ। इसका फायदा यह हुआ कि इसी टीम से जुड़े और लोगों ने मुझे अपनी अगली फिल्मों में काम देना शुरू कर दिया।
यह सबब कैसे बना?
इस फिल्म से जुड़े इकबाल ढिल्लों और जगदीप गिल ने छोटे बजट की फिल्म शुरू की ‘छोरा हरियाणे का’। इसमें एक बागड़ी भाषा जानने वाला एक्टर चाहिए था। मुझे यह भाषा बहुत अच्छी तरह आती थी। उन्होंने भी सोचा कि घर का ही लड़का है, पैसे भी कम लेगा (हंसते हैं)। उस फिल्म में उन्होंने मुझे विलेन का रोल दिया। मेरा यह रोल बहुत पसंद किया गया। इसके बाद मुझे विलेन के रोल वाली तीन फिल्में मिल गईं।
आपने फिल्में में हीरो और विलेन दोनों किरदार बड़ी शिद्दत से निभाए हैं। विलेन का किरदार निभाना ज्यादा अच्छा लगता है या हीरो का?
असल में मैंने जिन फिल्मों में हीरो के भी रोल किए हैं, उनमें भी ज्यादा टच विलेन वाला ही रहा है। ये रोल हमारे असल जीवन के भी नज़दीक थे, इस बात का फायदा भी मुझे मिला। पंजाब के हर गांव में लगभग इस तरह के किरदार और माहौल आपको मिल जाता है। घोड़े पालने, जीपें, हथियार रखने लगभग हर पंजाबी का शौक रहा है। दूसरा, विलेन के किरदार के बारे में आपने पूछा था, तो मेरा यह रोल भी कोई बुरा नहीं होता था। यह नैगेटिव और पॉज़ेटिव दोनों तरह का होता था।
गुग्गू गिल का डायलॉग बोलने का अपना खास अंदाज़ है। आज की फिल्मों में जब आपके इस अंदाज़ को इस्तेमाल किया जाता है, तो कैसा लगता है?
बहुत अच्छा लगता है। असल में हम भी अपने से बड़े कलाकारों की नकल करने की कोशिश करते थे। आज जब लोग हमारी नकल करने की कोशिश करते हैं, तो बहुत ही खुशी होती है।
क्या आजकल की फिल्मों की स्टोरी या किसी अन्य पक्ष में कोई कमी नज़र आती है? आज कॉमेडी फिल्में ही ज्यादा बन रही हैं।
यह ऐसा क्षेत्र है, जहां जब एक तरह की फिल्म हिट होती है तो उसी जैसी फिल्में बननी शुरू हो जाती हैं। पर यह बात भी है कि हर फिल्म में एक उच्चस्तर की कॉमेडी दिखाना बड़ा मुश्किल है। मुझे लगता है यही कारण है कि लोग अब एक जैसी फिल्में नहीं देखना चाह रहे। इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए।

आज कुछेक फिल्मों के संवादों में अश्लीलता आने लगी है। आप क्या कहना चाहेंगे?
यह बहुत बुरी बात है। हम कभी इस तरह के संवाद नहीं बोलते।
क्या इन चीज़ों को ‘चलता है’ कहकर चलते रहने देना चाहिए?
देखिए, यह ठीक नहीं है। हमारी फिल्मों में इस तरह का कुछ नहीं था। वे भी तो सुपरहिट रही हैं। उन्हें सारी फैमिली में बैठकर देखा जा सकता है। हमें अगर इस तरह के लचर डायलॉग्स के बारे में कोई कहेगा, तब भी हम इसके लिए तैयार नहीं। बाकी, यह काम मनोरंजन तक सीमित है। करोड़ो रुपया लगाकर कोई दूसरों को अक्ल नहीं देना चाहता और इस तरह कोई लेगा भी नहीं। हां इतना ज़रूर है कि फिल्म में से अगर कोई अच्छी बात सीख ली जाए, तो अच्छा ही है।
पर यूथ फिल्मों से प्रभावित होता है?
फिल्मों में अगर बहुत बुराई ही दिखाई जाती रहे, तो कहीं न कहीं जरूर असर आ सकता है। लेकिन मैं समझता हूं, आजकल का यूथ पहले से ज्यादा समझदार है। वह फिल्म को केवल मनोरंज का हिस्सा मानकर ही देखता है और इंजॉय करता है। यह नहीं कि वह फिल्म देखकर उसे अपना ही ले।
आम जीवन में गुग्गू गिल कैसे हैं?
मैं तो जी सीधा-साधा जट्ट बंदा हां। मेरे ख्याल में मैं फिल्मों में भी ऐसा ही पेश हुआ हूं। बनावट मुझमें बिल्कुल नहीं है।
परिवार में कौन-कौन है?
मेरी पत्नी और दो बेटे हैं।
बच्चों का रुझान है फिल्मों की ओर?
नहीं, उनका रुझान तो नहीं है। दूसरा यह ज़रूरी भी नहीं कि वह मेरे बेटे हैं, तो उन्हें फिल्मों में ही काम करना चाहिए। वे आना चाहें, तो आ सकते हैं। असल में फिल्मों का काम कोई आसान काम नहीं है। बहुत मेहनत करनी पड़ती है।
अपनी फिल्मों में आपको अपना सबसे पसंदीदा किरदार कौन-सा लगता है?
जट्ट जिऊणा मौड़।

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