कुलदीप माणक को पुण्यतिथि पर याद करते हुए

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kuldeep manak
kuldeep manak

कलाकार अपनी तमाम जिंदगी कला को समर्पित कर देता है। अपनी कला से अपना नाम तो बनाता ही है साथ ही अपने प्रांत का अपने देश का नाम भी रोशन करता है। एक खास मुकाम पर पहुंचने के बाद भी कलाकार अगर गरीबी और मुश्किलों से लड़ता जूझता इस दुनिया को अलविदा कह के जाए तो किस की गल्ती मानी जाए। खैर हम इस पर कोई चर्चा नही करेंगे। आज कुलदीप माणक की
पुण्यतिथि है। आज कुलदीप जी को याद करते हुए कुछ उनके बारे में। कुलदीप जी का जन्म 15 नवंबर 1951 में हुया। जन्म के स्य माणक का नाम लतीफ मुहम्मद रखा गया था। कुलदीप को संगीत विरासत में ही मिला था। इनके बड़े महाराजा हीरा सिंह (नाभा) के दरबार में हज़ूरी रागी थे।

शुरू में कुलदीप माणक ने सहायक के रूप में गाना शुरू किया फि धीरे धीरे अपना जोड़ी सीमा के साथ बना मात्र 50 रुपए में अखाड़े में गाना शुरू कर दिया। एच.एम.वी वालों ने जब कुलदीप को गाते सुना तो अपनी कम्पनी के तहत कुलदीप और सीमा ने अपना पहला गाना ‘जीजा अखिंया ना मार’रिकॉर्ड किया।कुलदीप माणक का यह गीत बहुत फेमस हुया। बस फिर क्या था हर तरफ माणक माणक हो गई।गीतकार हरदेव दिलगीर जो कि देव थरिके वाले के नाम से लिखते है। उन्होने कुलदीप माणक को गाते सुना। तब उन्होने कुलदीप के लिए कली लिखी ‘तेरे चेहरे ते ओह सूरत दिंदी आ हीर दी’लिखा। कुलदीप ने इसे गाया और ‘कलियां वाला बादशाह’के नाम से मशहूर हो गए।
मशहूर गायक जैज़ी बैंस कुलदीप माणक को अपना गुरू मानते हैं। वह कहते हैं मैं कुलदीप माणक साहिब के गाने सुनते गुनगुनाते ही बड़ा हुआ हूं।माणक साहिब के बाद उनके परिवार का ख्याल जैजी ने ही रखा।

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